गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

अपनत्व से चमकती निगाहें

सफर में साथी , समां और सामाँ सब तय है , सब वही रहेगा ; अब ये समन्दर की मर्जी है के वो भँवर में तुझे गर्क कर दे या ज़िन्दगी के किनारों पर ला पटके।  इस सारी छटपटाहट को अर्थपूर्ण बना। किस ओर तेरी मन्जिल और किधर जा रहा है तू। ऐ नादान मुसाफिर , अनमोल तेरा जीवन , कौड़ियों के भाव जा रहा है। इतना भी न कमतर समझना राहगीरों को , जगमगाता हुआ जीवन तेरे साथ चल रहा है। कौन जाने किस-किस पर है क्या-क्या गुज़री ; आधी-अधूरी धूप छाँव में ,किस के हिस्से क्या-क्या आया। मुंदी-मुंदी पलकों में सपने भी थे , बड़े अपने भी थे , ये और बात है मुट्ठी से वक़्त फिसलता ही रहा , सपनों की मानिन्द। 

अपनत्व से चमकती निगाहें माहौल में जान फूँक देतीं हैं। दिलासे ,बहाने सब छलावे से लगते हैं। किसी की पीड़ा कोई नहीं बाँट सकता। हाथ पकड़ कर चलता हुआ भी कितना सगा हुआ है।  मुसीबत के वक़्त देख लो क्या क्या टूटा हुआ है। बात इतनी सी है कि वक़्त चाहे जितना मिटा डाले ;जीने के लिये बहाना तो चाहिये।  अँगारों पे नींद किसे आती है। मुस्करा कर कोई जो साथ चले , पल भर में ज़िन्दगी सँवर जाती है। 

बुधवार, 25 मार्च 2015

अपनत्व का दायरा बड़ा कीजिये

समाज में अपराधों का बढ़ता ग्राफ लगातार ये कह रहा है कि आदमी मन के तल पर बीमार है। उपचार भी मन के तल पर ही करना होगा। प्राण-शक्ति की कमी या तो उसे भरमा कर , भटका कर अपराध की दुनिया में सुकून या कहो मजा तलाशने धकेल देती है या अवसाद की तरफ धकेल देती है। लगातार बदलती हुई इस दुनिया में मन भी लगातार ऊपर नीचे हुए जा रहा है , इसीलिये बेचैन है , उद्विग्न है , असहज है। कुछ है जो इस सब को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है , कभी लड़ना चाहता है , कभी सामना करना चाहता है तो कभी भागना चाहता है।  गहरी परतों में कुछ ऐसा भी है जो बदला नहीं है , सब कुछ देख रहा है पर उसका जोर कोई नहीं चलता।

सुखी और सन्तुलित मन का मूल-मन्त्र है आत्मीयता का दायरा बढ़ा कर रखना। जैसा भाव होगा वैसा ही मन होगा और वैसी ही मानसिक स्थिति बन जायेगी। अपनत्व दिखाने की चीज नहीं है , ये खुद ही आँखों से टपक पड़ेगा।  आपको किसी के भी आगे बिछने की जरुरत नहीं है , ना ही पैसा-धेला खर्चने की जरुरत है ; बस उसे अपना समझना है।  अपना मानते ही आप उसके साथ नाइन्साफ़ी नहीं कर पायेंगे।  जिस तरह आप अपने साथ सहज-सरल हैं  वैसे ही रहना है। कहा जाता है कि आप बिना प्यार के भी किसी को कुछ भी दे सकते हैं मगर जिसे आप प्यार करते हैं उसे बिना कुछ दिये रह नहीं पाते हैं । प्यार का रास्ता इकतरफा होता है , हमें सिर्फ अपना पता होना चाहिये कि हमें क्या करना है।  अपनत्व ही वो शय है जो हम अपने लिये दूसरों से खोजते फिर रहे हैं और हमें नहीं मिलती।  इस दुर्लभ चीज का अभ्यास अगर हम सुलभ कर लेते हैं तो एक दूसरी ही बत्ती जल उठेगी ; जिसके प्रकाश में हम सारी दुनिया को एक छत के नीचे एक समग्र दृष्टिकोण से देख सकेंगे।

सबको अपना मान चलने वाला व्यक्ति , समाज सभ्यता नैतिकता के नियम नहीं तोड़ता। हालाँकि एक बारीक लाइन ही होती है मन को इधर या उधर ले जाने वाली , फिर भी मन अगर सजग है तो ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर भी सन्तुलित रहने वाली बाउण्ड्री लाइन क्रॉस नहीं करेगा। ये बिल्कुल तीसरी आँख खुलने जैसा है। जितने भी पहुँचे हुये पीर पैगम्बर हुये हैं सबके पास ये जादू की छड़ी थी।  अपनत्व का ये भाव गहरा विष्वास और आस्था ले आता है और व्यक्ति की प्राण-शक्ति असीम होने लगती है। प्राण-शक्ति बढ़ते ही मन तनाव रहित हो जाता है। रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ जाती है।  उस चेतना से जब तक परिचय नहीं हो जाता , हम सन्तुलित रह ही नहीं सकते। वही चेतनता हमें नश्वरता के बीच भी स्थिर और अटूट रख सकती है।

जब भी मन विध्वंस की तरफ जाता है या भागना चाहता है ,रुक कर जरा सोचें कि हालात बदलते रहेंगे तो क्या आप झूले की तरह हिलते हुये अपने आपको इतना कष्ट देते रहेंगे। सोचें कि रोज ऐसा नहीं होगा , बुरा आपके अहम को लगता है , वो भी इसलिये क्योंकि आप सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं , कारणों को नहीं देख पाते। अवसाद है तो क्यूँ है , मन के कपड़े बदलवा दीजिये , इसे कोई और सोच दीजिये , रोज वही कमीज थोड़ी न पहनेंगे। अपनी छोटी सोच से ऊपर उठें । अपनी बीमार सोच को स्वस्थ्य करें। अपनत्व का दायरा बड़ा कीजिये। ये काम हमारे अध्यापक लोग , बच्चों के माँ-बाप बखूबी कर सकते हैं ; ताकि हमारी नई फसलें यानि हमारे बच्चे इसको जीवन में उतार सकें ; मगर शिक्षा देने से पहले ये उन्हें अपने जीवन में उतारना होगा। तभी शायद हमारे हालात बेहतर हो सकेंगे। 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

सँस्कार-शीलता

दिल दिमाग बुद्धि के लिये अंग्रेजी के शब्द-कोष में शब्द हैं , मगर मन के लिये कोई शब्द नहीं है।  इसी तरह सँस्कार व सँस्कार-शीलता के लिये के लिये  भी अंग्रेजी में कोई सटीक शब्द नहीं है।  हर भाषा की अपनी विशेषता होती है , बात कहने का अपना अन्दाज़ होता है ;दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय अनुवादक को विशेष ख्याल रखना होता है कि वो कही गई बात का हू-ब-हू चित्रण सटीक शब्दों के माध्यम से कर सके। 

सँस्कार मायने आदत....... सँस्कार-शीलता को अच्छी आदतों व इन्सानियत से जुड़ा माना जाता है। अंग्रेजियत को बढ़ावा देते आज के सभ्य समाज में सँस्कार-शीलता पुरानी व आउट-डेटेड चीज हो गई है , जिसे हर कोई जल्द से जल्द घर से बाहर बुहार देना चाहता है।  हर धर्म ने हमें एक ही चीज सिखाई , हालांकि आदमी बाहरी आडंबरों में उलझ कर धर्म के नाम पर भी आपस में लड़ लेता है।  कहते हैं दूसरा धर्म अपनाने से अच्छा होता है कि अपना धर्म निबाहें , मानें , जो हमें जन्म से मिला है।ऐसा इसलिये भी कहते हैं कि जो बात हमारे बचपन से चली आ रही हो या हमने तब से सीखी हो वो हम पर .... हमारे अवचेतन पर ताउम्र प्रभावी रहती है। उसे समझना आसान होता है ,अनुसरण करना भी आसान होता है। इसका असर पूरी उम्र रहता है और इस तरह आस्था पक्की होती है। हर धर्म के किस्से-कहानियाँ अलग-अलग होते हैं मगर इशारा या सार एक ही होता है।  एक खुदा और एक ही आधार , इन्सानियत और आत्म-उन्नति।  

धर्म की जरुरत हमें उस वक़्त पड़ती है जब सँसार की ठोकरें या नश्वरता हमें डाँवाडोल कर देती है।  आह कोई चीज , कोई बात हमें इस कष्ट से निकाल ले। धर्म पंगु नहीं बनाता वरन आधार देता है।  सँस्कार-शीलता , in long term pays .,कोई भी विचार ,कोई भी भाव खाली नहीं जाता , हम तक वापस लौट कर आता है।   रिश्तों की गरिमा निभाना , इंसानियत कोई यूँ ही नहीं सीख जाता। सँस्कार-शीलता झाड़ू से बाहर बुहारने वाली चीज नहीं होनी चाहिये ,जिस तरह घर में एन्टीक पीस सजाये जाते हैं ,उसी तरह सँस्कार-शीलता हमारे व्यक्तित्व में सजाने लायक एन्टीक पीस होना चाहिये जिसे दुर्लभ होने पर भी हमने सुलभ कर लिया हो।  भले ही उसके लिये हमें कितने ही महँगे सौदे करने पड़े हों , सार्थक हैं।  

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

जितनी ज्यादा नकारात्मकता ,उतनी ज्यादा सकरात्मकता

क़ैद में है बुलबुल , सैय्याद मुस्कुराये 
फँसी है जान पिंजरे में , हाय कोई तो बचाये 

कोई तो हाथ-पैर छोड़ कर दुबक कर बैठ जाता है और कोई सारी रात टुक-टुक कर पिंजरे की तारों को या हाथ आई हुई लकड़ी की सतह या कपड़े को सारी रात कुतर-कुतर कर काटता रहता है ;जिस रोटी के टुकड़े के लिये वो इस पिंजरे में फँसा था , वो अब यूँ ही लटका मुँह चिढ़ाता हुआ नजर आता है।  जाहिर है अब चूहे की सारी कवायदें इस मुसीबत से स्वतन्त्र होने के लिये हैं।  ठीक ऐसा ही तो आदमी का हाल है।  कोई तो मुश्किलों से हार मान कर हथियार डाल देता है और कोई सारी ताकत उससे लड़ने में लगा देता है।  जितनी ज्यादा नकारात्मकता हो उतने ज्यादा सकारात्मक बनो , तभी नकारात्मकता अपना असर खो देगी।  ये सच है कि मन शरीर से भी ज्यादा शक्तिवान है और मन से भी ज्यादा शक्ति बुद्धि के पास है।  बुद्धि यानि विवेक , विवेक-पूर्ण मन क्या नहीं कर सकता , बाहरी उपद्रव हमारे मन का सन्तुलन भंग नहीं कर सकते , इतनी शक्ति हमारे अन्दर ही विद्यमान है।  

अगर जीवन में संघर्ष नहीं होगा तो यकीन मानिये विकास का कार्य भी रुक जायेगा। ......फ्रेडरिक डकलस 

यदि आप विफल हो रहे हों , तो समझिये कि सफलता के बीज बोने का सर्वश्रेष्ठ समय आ गया है...... परमहँस योगानंद 

दबाव और चुनौतियाँ आगे बढ़ने के अवसर की तरह होते हैं।  इन्हें रूकावट मानने की भूल न करें।... कोबे ब्रायंट 

बहुत सारे तरीके हैं मन को समझाने के , मेरे साथ कुछ भी नया नहीं हुआ है , Nothing is new under the sun.असफलताएँ ही आदमी को माँजती हैं।  बेशक तुम्हारी उमंगें टुकड़ा-टुकड़ा हो जायें , जीने के सारे मक्सद खो जायें , खुद को चुनौती दें कि मैं अन्दर से नहीं हिलूँगा। ये मुझ पर है कि अपने हाथों की लकीरों में मैं कौन सा रँग भरता हूँ। मुझे तो खुश होना चाहिये कि तनाव मेरी बर्दाश्त के अन्दर ही है। ये अनुभव बहुत कुछ सिखा के जायेगा। अपनी कामनाओं की नकेल अपने हाथ रखें।  ज़िन्दगी का उद्देश्य शान्ति प्राप्त करना है , पैसे या दुख में अटकना नहीं।  इसीलिये हमें अपने कर्तव्य प्रसन्नता-पूर्वक निभाने चाहिये , ये पृथ्वी स्वर्ग नजर आयेगी। 

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

विष्वास करना कला है , साथ ही विज्ञानं भी...

बड़ी कोशिशों से पासपोर्ट रिन्यू करवाने के लिए अपोइन्टमेंट मिला था। सारी औपचारिकताएँ पूरी हुईं तो एक एफ़िडेबिट बनवाने की क्वैरी निकल ही आई।  टीना काउन्टर से एफ़िडेबिट कहाँ से और कैसे बनेगा पूछ कर जैसे ही मुड़ी , ऑफिसर पास ही खड़ी दूसरी लड़की के लिए कह रहा था कि इन मैडम को भी एफ़िडेबिट बनवाना है। जिसे सुनकर वो लड़की मायूस हो गयी थी ,कि अब फिर लटक गया , दुबारा से अपोइन्टमेंट लेना पड़ेगा।  टीना ने उसका उतरा चेहरा देख कर बात करने की पहल की। कहा " टेन्शन मत लो ,मुझे भी बनवाना है , मैं यहाँ नई हूँ , चलो दोनों साथ चलते हैं ,एक ऑटो करते हैं , इससे पहले कि ऑफिस बन्द होने का वक्त हो जाए ? जल्दी करते हैं। " खैर दोनों जल्दी-जल्दी काम करवा कर लाये। अब इस ऑफिस में आखिरी काउन्टर पर दो हजार रूपये देने थे।  रूबी ने पैसे गिनने शुरू किये , अरे ये क्या १९०० रूपये यानि १०० रूपये कम.... अब क्या करे ,यहाँ तो कोई उसे जानता भी न था।  और आसपास कहीं A.T.M.भी नहीं था। एक बार फिर उसका मुहँ उतर गया।  टीना ने दूर से उसे पशो-पेश में देखा , पास जा कर पूछा कि क्या बात है।  टीना को १०० रूपये का नोट निकाल कर रूबी को देने में देर नहीं लगी।  रूबी का काम हो गया और वो रसीद ले कर बाहर चली गई।  टीना अभी क्लीयरेंस का इन्तज़ार कर रही थी , सोच रही थी कि सौ रूपये तो यूँ ही खर्च हो जाते हैं , कितना तो हम अपने खाने-पीने पर मौज-मस्ती पर खर्च करते हैं ,कपड़ों पर न जाने कितना प्रॉफिट दुकानदार हमसे ऐंठते हैं।  रूबी को सिर्फ सौ रूपये की वजह से वो सारी औपचारिकताएँ दुबारा करनी पड़तीं।  पैसे वापिस आयेँ या न आयेँ ,क्या फर्क पड़ता है।  छह बजते न बजते टीना का काम भी हो चुका था। जैसे ही वो ऑफिस से बाहर निकली , रूबी उसका इन्तज़ार कर रही थी , रूबी दोनों बाहें बढ़ा कर उसके गले लगी। उसके दिल की नमी उसकी आँखों से ज़ाहिर हो रही थी।  उसने बताया कि तीन महीने पहले ही उसकी शादी हुई है और उसका नौशा दुबई में उसका इन्तज़ार कर रहा है।  पासपोर्ट बनने के बाद ही वीज़ा की औपचारिकताएँ पूरी हो सकेंगी।  उस वक्त सौ रूपये की कमी से काम रुक जाना था।  दोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर एक्सचेंज किये।  टीना को रात की ट्रेन से अपने शहर वापिस जाना था। अब उसे अपना काम पूरा होने के साथ-साथ रूबी के काम पूरा करने में थोड़ी सी मदद-गार बन पाने की भी ख़ुशी थी।  

विष्वास करना एक कला है।  हम अपने आपको किस तरह समझाते हैं कि आँखें खुली रखते हुए हमें दूसरे पर विष्वास करना है।बिना ऐतबार के आप दो कदम भी नहीं चल सकते। ये दुनिया आपको काँटों की बाड़ी ही नजर आयेगी।  लोगों की आँखों में सन्देह और अविष्वास ही तैरता नजर आयेगा। काँटों पर चल कर भी आपको फूल उगाने हैं।  विष्वास ही वो शय है जो हर विपरीत परिस्थिति में भी फल-फूल सकती है , आश्चर्य जनक नतीजे ला कर असम्भव को सम्भव कर सकती है। सभी लोग अगर स्वार्थी हो जायेंगे तो सामाजिकता के सारे दावे खोखले साबित हो जायेंगे। किसी की भी आँखें अविष्वास को बड़ी आसानी से पढ़ लेती हैं।  हमें अपने मन को समझाने का आर्ट आना चाहिए ताकि हम थोड़े बहुत नुक्सान पर भी किसी बड़ी चीज को कमा सकें। 

हम इसे साइन्स इस लिए कह सकते हैं कि साइन्स तो प्रयोग का नाम है। विष्वास का प्रयोग कर के देखें ,अपना मन ठण्डा ,रिश्तों में प्रगाढ़ता और अपने आस पास खुशिओं का वातावरण इसी का नतीजा है। सहजता , सरलता ,सरसता इसी का नाम है।  हाँ , सजगता अपने आप आ जाएगी। दुनिया चाहे इसे भावनात्मक बेवकूफी कहे मगर मेरी नजर में इसे भावनात्मक समझदारी या अक्लमन्दी कहा जाना चाहिये। 

बेशक आदमी ही आदमी की काट करता है और उसका दिमाग इस राह पर इतनी तेज चलता है कि वो हर मुमकिन तरीके से दूसरे को छलता नजर आता है मगर ....
वो बन सकता था खुदा 
अपनी कीमत उसने खुद ही कमतर आँक ली होगी ....

रविवार, 7 सितंबर 2014

सबला है नारी

नारी अबला नहीं है।  वहशी दिमागों का जोर किसी पर भी उतना ही कारगर है , चाहे वो नर हो या नारी हो ; क्योंकि वो तो उनका सुनियोजित मकड़जाल होता है , बिना तैय्यारी जिसमें कोई भी फंस सकता है।  नारी उपभोग की वस्तु नहीं है।  पुरुष अपने अहम पर चोट बर्दाश्त नहीं करता , इसे ताकत नहीं कमजोरी कहेंगे।  नारी अगर पुरुष के अहम को सन्तुष्ट करती नजर आती है तो ये नारी की सहनशक्ति है।  नारी की सहन-शीलता को गलत अर्थों में उठा लिया गया।  उसने अपने घर की शान्ति को बरकरार रखना चाहा , इसे तो समझ-दारी कहना चाहिए। वो भी हाड़-माँस की बनी है , दिल-दिमाग रखती है।  

जहाँ-तहाँ नारी को अश्लील सामाग्री की तरह परोस दिया गया , जबकि नारी के सम्मोहक रूप से इन्कार नहीं किया जा सकता।  ज़िन्दगी को , परिवार को पूरा करने के साथ-साथ ,परिवार को एक सूत्र में बाँधे रखने में नारी की अहम भूमिका होती है। परिवार के सदस्य अगर तृप्त नहीं हैं तो उनके व्यक्तित्व पर उसका असर दिखता है। ये कुण्ठाएँ आदमी को अवन्नति की ओर धकेलतीं हैं। यौन-शोषण ,किशोरों की अपराधिक मानसिकता ,धोखा-धड़ी ,आँखों में तिरते अविष्वास के उदाहरण हमारे आस-पास बिखरे पड़े हैं।  ये अतृप्त भटके हुए मन और कमजोर जड़ों के नतीजे हैं।  पौधे की जड़ें जितनी मजबूत होतीं है वो उतना ही ज्यादा फलता-फूलता है।  व्यक्ति का मन जितना सुन्दर होता है व्यक्ति उतना ही सहज,सरल और दमदार होता है। अन्तर्मन की खूबसूरती के बिना बाहरी सुन्दरता ज्यादा देर टिकती नहीं।  और ये खूबसूरती तो अर्जित की जा सकती है। 

बुद्धि-बल के सामने शरीर-बल गौण है।  आज बुद्धि-जीवी ही बड़े ओहदों पर बैठे हैं ,बड़ी-बड़ी नौकरियां कर रहे हैं।  नारी भी पुरुष से कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही है।  नारी तो दोहरी जिम्मेदारी निभाती है। गृहस्थी की गाड़ी को ढोने में नारी की महत्त्व-पूर्ण भूमिका होती है। 

बाहरी उपद्रव जब आक्रमण करेंगे तो आँच सीने तक तो पहुँचेगी ही , मगर नारी के पास वो कला है जो उस आँच को ऊर्जा में तब्दील कर लेती है जो उसे हर हाल में कभी मुड़ना-तुड़ना सिखाती है , कभी बिखरती इकाइयों को अपने पँखों में समेट लेना सिखाती है तो कभी टूटते विष्वास को श्रद्धा का पानी पिला कर सर का ताज बना लेने की ताकत देती है।  अपने घर की सारी व्यवस्था की देख-रेख नारी के हाथ है , वो चाहे तो अपने परिवार के सदस्यों के दिलों पर राज करे , यहाँ तक कि वो तो सारी उम्र अपने बच्चों के व्यक्तित्व के जरिये दुनिया से सँवाद करती रहती है , उदाहरण बन सकती है , तो फिर नारी अबला कैसे हुई।  नारी तो सबला है। 

बुधवार, 9 जुलाई 2014

ये बन्दूकें क्यूँ बोते हैं '

किसी शायर ने सटीक कहा है।  

' हम अपने -अपने खेतों में '
गेहूँ की जगह , चावल की जगह ,
ये बन्दूकें क्यूँ बोते हैं '

नफ़रत की चिन्गारी को हवा देते ही शोले भड़क उठते हैं।  चन्द लोगों के सीने की नफ़रत व्यवसाय का रूप क्यों ले लेती है ? कम उम्र का युवा मन जिसे कच्ची मिट्टी की तरह जिधर चाहे मोड़ लो , चोट खाये हुए दिल को और उकसा कर विध्वंसक गतिविधियों में उलझा दिया जाता है।  उसे पता ही  नहीं चलता कि उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।  उसका रिमोट तो आकाओं के पास है , जिन्होंने उस चिन्गारी को बारूद में ढाला है।
इन्सान का दिल हमेशा पुरानी चीजों को याद करता है।  बचपन , माँ , सँगी-साथी क्या कभी भूले से भूलते हैं।  अतीत क्या कभी यादों से मिटाया जा सका है।  उनसे आँख चुराने का मतलब ही यादें कड़वी हैं।  जिस दिन 'कसाब' को उसके गाँव के लोगों ने पहचानने से इन्कार कर दिया था , उसके माँ-बाप भी वो गाँव छोड़ कर कहीं चले गये थे।कलम ने लिखा था.…… 

वो गलियाँ , वो दीवारें
बेज़ुबान बोलें कैसे
पहचानतीं हैं तेरी आहटें
मगर भेद खोलें कैसे

नक़्शे में है तेरा वतन
जैसे है वो तेरी यादों में
लाख कर ले तू जतन
वक़्त के मोहरे को वो अपना बोलें कैसे

तेरे वतन के लोग
जिनके लिये तूने दाँव खेले
साथ देती नहीं परछाईं भी
मुसीबत में ,वो ये बात खोलें कैसे

आतँक-वाद की दुनिया ही अलग होती है।  जिस काम को दुनिया से छिपा कर किया जाये , निसन्देह वो गलत होता है।  अपने ही वतन से जैसे जला वतन कर दिये गये हों।  दुखद बात ये है कि फिर लौटा नहीं जा सकता।न जमीं बचती है पैरों तले , न आसमाँ ही शेष रहता है। जमीं मतलब ज़मीर , इन्सान का खून देख कर भी जो न पसीजे, उसे क्या कहेंगे। उसने ज़मीर के मायने ही गलत उठा लिये हैं।  आसमाँ मायने स्वछन्दता , निडरता ... जहाँ तू आराम से उड़ सके।  निश्छलता के बिना ये आसमान तेरा नहीं।  खौफ के साथ निडर कभी रहा ही नहीं जा सकता।  

हम दुनिया में ये सब तो नहीं करने आये थे।
हर ज़र्रा चमकता है नूरे-इलाही से 
हर साँस ये कहती है के हम हैं तो खुदा भी है 

बस कोई नूर वाली आँख ही उसे देख सकेगी , महसूस कर सकेगी। जो किसान हमें गेहूँ चावल देता है , आम आदमी जो कपड़ा छत मुहैय्या कराता है , जिसके दम पर हमारा जीवन और वैभव आश्रित है , हम उस पर ही अन्याय कर बैठते हैं।  जैसे अपनी ही जड़ें खोद रहे हों।  बन्दूकें बोयेंगे तो बन्दूकों की फसल ही काटेंगे।  जिस तकलीफ ने उकसाया हो , रुक कर जरा सोचें कि इस तड़प को…इस उनींदी को सार्थक कर लें।  कोई सुबह होने को है।  मन को भी वो दिशा दें कि फिर ये हादसे न घट पाएं।  अपने जैसों को भी उबार लाएं।